जब बेटी ने निभाया बेटे का फर्ज: पिता को मुखाग्नि देकर आराध्या ने लिख दी एक नई इबारत
छत्तीसगढ़ खबर डेस्क खबर 24×7 खैरागढ़। श्मशान घाट पर उस दिन सन्नाटा कुछ ज्यादा ही गहरा था। चिता के पास खड़ी एक बेटी, हाथ में अग्नि लिए, सामने लेटे अपने पिता को आखिरी बार निहार रही थी। यह पल था खैरागढ़ निवासी लाल चिंता हरण सिंह के पुत्र स्व. राजेन्द्र सिंह की अंतिम यात्रा का, जहां उनकी बड़ी बेटी आराध्या सिंह ने वह जिम्मेदारी निभाई, जो सदियों से सिर्फ बेटों के हिस्से मानी जाती रही है।
कहते हैं बेटी जब पैदा होती है, तो पिता की दुनिया बदल जाती है। और जब वही बेटी बड़ी होकर पिता को अंतिम विदाई देती है, तो मानो पूरा जीवन-चक्र एक गहरे अर्थ के साथ पूरा हो जाता है। आराध्या के लिए यह कोई आसान पल नहीं था — लेकिन उन्होंने बिना किसी हिचक के यह दायित्व निभाया और यह संदेश दे दिया कि पिता-पुत्री का रिश्ता किसी सामाजिक परिभाषा का मोहताज नहीं।
अंतिम संस्कार में मौजूद परिजनों और ग्रामीणों की आंखें उस पल नम हो गईं, जब आराध्या ने चिता को अग्नि दी। कई लोगों ने इसे “बेटी के प्रेम की सबसे बड़ी मिसाल” करार दिया, तो कुछ ने कहा कि यह दृश्य आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सीख बनकर रहेगा — कि बेटियां किसी भी दायित्व को निभाने में कभी पीछे नहीं रहतीं, चाहे वह जीवन की सबसे कठिन घड़ी ही क्यों न हो।
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राजेन्द्र सिंह की यह अंतिम यात्रा अब सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे खैरागढ़ क्षेत्र की भावनाओं से जुड़ी एक घटना बन चुकी है — जहां एक बेटी के आंसुओं के साथ-साथ उसकी हिम्मत ने भी सबका दिल छू लिया।
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