संगीत विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस, कला-संस्कृति की गौरवशाली विरासत का बखान
छत्तीसगढ़ खबर डेस्क खबर 24×7 खैरागढ़। राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस समारोह का आयोजन गरिमामय माहौल में किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राज्य गीत और विश्वविद्यालय गीत से हुई। इसके बाद राज्यपाल एवं कुलाधिपति रमेन डेका, सांसद संतोष पांडे और कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया तथा राजकुमारी इंदिरा सिंह के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई।
कुलपति ने राज्यपाल का स्वागत किया, वहीं सांसद का स्वागत नारियल, फल एवं पुष्प भेंट कर किया गया। विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलसचिव आर. वेंकट रमण गुड़े ने कुलपति का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजन यादव ने किया। समारोह में राजपरिवार की सदस्य राजकुमारी शताक्षी सिंह, सांसद प्रतिनिधि भागवत शरण सिंह, जिला प्रशासन के अधिकारी, जनप्रतिनिधि, विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, कर्मचारी, विद्यार्थी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
कुलपति ने रखीं उपलब्धियां, संसाधनों की कमी की ओर खींचा ध्यान
कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने स्वागत उद्बोधन में विश्वविद्यालय की 70 वर्षों की विकास यात्रा, शैक्षणिक उपलब्धियों और कला शिक्षा में योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित कलाकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया है और यहां के विद्यार्थी देश के केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों, एकलव्य विद्यालयों सहित प्रतिष्ठित संस्थानों में कला शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं। विश्वविद्यालय में देश के विभिन्न राज्यों के साथ नेपाल, बांग्लादेश, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, वियतनाम के विद्यार्थी एवं शोधार्थी अध्ययन कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में पहली बार महिला यूथ पार्लियामेंट के आयोजन की स्वीकृति भारतीय विश्वविद्यालय संघ से मिली है, जिसका आयोजन जनवरी में प्रस्तावित है। कुलपति ने शिक्षकों, संगत कलाकारों एवं कर्मचारियों की कमी और अतिरिक्त भवनों की आवश्यकता बताते हुए शासन से सहयोग की अपेक्षा जताई।

राज्यपाल बोले—लोककलाओं को डिजिटल माध्यमों से दें वैश्विक पहचान
राज्यपाल एवं कुलाधिपति रमेन डेका ने कहा कि विश्वविद्यालय की 70 वर्षों की यात्रा विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों और इससे जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के सामूहिक योगदान का परिणाम है। उन्होंने दानवीर राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती द्वारा अपनी पुत्री राजकुमारी इंदिरा सिंह की स्मृति में विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए किए गए योगदान को ऐतिहासिक बताया।
राज्यपाल ने कहा कि संगीत मनुष्य को मानसिक शांति देता है, जबकि नृत्य, चित्रकला और शिल्प समाज के इतिहास एवं सांस्कृतिक जीवन को अभिव्यक्त करते हैं। छत्तीसगढ़ की पंडवानी, पंथी, राउत नाचा, सुवा नृत्य, कर्मा और बस्तर की जनजातीय नृत्य परंपराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश की समृद्ध लोककलाओं को मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल मीडिया के माध्यम से देश-विदेश तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से कला के क्षेत्र में सफलता के लिए प्रतिभा के साथ धैर्य, निरंतर अभ्यास और समर्पण बनाए रखने का आह्वान किया। साथ ही कला को आजीविका और व्यवसाय से जोड़ने की संभावनाओं पर भी जोर दिया।
अद्वितीय और अनुकरणीय है राजा-रानी द्वारा महल का दान देना: सांसद संतोष पांडे
सांसद संतोष पांडे ने कहा कि राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती ने अपनी पुत्री की स्मृति में विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए जो दान दिया, वह अद्वितीय और अनुकरणीय है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जमीन दान करना भी कठिन हो गया है, लेकिन राजपरिवार ने दूरदर्शी सोच के साथ ऐसा संस्थान स्थापित किया, जिसने खैरागढ़ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
कहा कि यहां देश-विदेश के ख्यातिप्राप्त कलाकार आ चुके हैं और हजारों विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय पूरे क्षेत्र और छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। अपने संबोधन में उन्होंने भारत भारती की पंक्तियों के माध्यम से शिक्षा, कला-कौशल, परिश्रम और राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करने का संदेश दिया तथा संस्थापक राजपरिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।

स्कूलों में कला शिक्षकों की नियुक्ति की मांग, कुलसचिव ने जताया आभार
कार्यक्रम के दौरान मंच संचालन डॉ. राजन यादव ने लोक साहित्य और लोक संगीत को शास्त्रीय कला शिक्षा के साथ जोड़ने की जरूरत बताई। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रदेश के प्रत्येक जिले के दस हायर सेकेंडरी स्कूलों में ललित कलाओं के शिक्षक नियुक्त किए जाएं, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को स्थानीय स्तर पर गायन, वादन, नृत्य और लोकसंगीत का प्रशिक्षण मिल सके।
उन्होंने कहा कि इससे विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय तक पहुंचने से पहले ही कला शिक्षा के अवसर उपलब्ध होंगे। अंत में विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलसचिव आर. वेंकट रमण गुड़े ने राज्यपाल, सांसद, कुलपति, राजपरिवार के सदस्यों, जिला प्रशासन, प्राध्यापकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों और आयोजन समिति के प्रति आभार व्यक्त किया। सांस्कृतिक संध्या में मुंबई के डॉ. जुनेर हलीम खान, इंदौर की डॉ. सुचित्रा हरमलकर तथा पद्मश्री डॉ. राधेश्याम बारले एवं उनके समूह की प्रस्तुतियां समारोह का प्रमुख आकर्षण रहा।



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