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मंच पर गूंजा एकलव्य का दर्द: IKSVV में ‘एक और द्रोणाचार्य’ ने दर्शकों को झकझोरा, पूछा- प्रतिभा का हक कौन छीन रहा?

मंच पर गूंजा एकलव्य का दर्द: IKSVV में 'एक और द्रोणाचार्य' ने दर्शकों को झकझोरा, पूछा- प्रतिभा का हक कौन छीन रहा?
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मंच पर गूंजा एकलव्य का दर्द: IKSVV में ‘एक और द्रोणाचार्य’ ने दर्शकों को झकझोरा, पूछा- प्रतिभा का हक कौन छीन रहा?

छत्तीसगढ़ खबर डेस्क खबर 24×7 खैरागढ़। एक गुरु, एक शिष्य और एक कटा हुआ अंगूठा… हजारों साल पुरानी कहानी, लेकिन सवाल आज भी वही। राजकुमारी इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के कैम्पस 2 ऑडिटोरियम में डॉ. शंकर शेष द्वारा लिखित नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य’ का ऐसा मंचन हुआ कि दर्शक अंत तक सांस थामे बैठे रहे। डॉ. शिशु कुमार सिंह के निर्देशन में कलाकारों के दमदार संवाद और अभिनय ने पूरे सभागार को बांधे रखा। इस दौरान कुलपति डॉ. लवली शर्मा, डॉ. राजन यादव, डॉ. मानस साहू और डॉ. कौस्तुभ रंजन मौजूद रहे।

नाटक का आधार महाभारत का वह प्रसंग है, जिसमें निषाद पुत्र एकलव्य धनुर्विद्या सीखने गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचा। अर्जुन को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन दे चुके द्रोणाचार्य ने उसे शिष्य बनाने से साफ इनकार कर दिया। एकलव्य टूटा नहीं। उसने जंगल में द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाई, उसी को गुरु मानकर अभ्यास किया और अद्भुत कौशल हासिल कर लिया। जब द्रोणाचार्य को यह पता चला, तो उन्होंने गुरु दक्षिणा में एकलव्य का दाहिना अंगूठा मांग लिया। यहीं से शुरू होता है नाटक का असली सवाल।

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मंच पर गूंजा एकलव्य का दर्द: IKSVV में 'एक और द्रोणाचार्य' ने दर्शकों को झकझोरा, पूछा- प्रतिभा का हक कौन छीन रहा?

‘एक और द्रोणाचार्य’ इसी पुरानी कथा को आज के कटघरे में खड़ा करता है। मंच पर अदालत सजी, वकील और जज आमने-सामने आए, प्रिंसिपल और प्रेसिडेंट भी सवालों के घेरे में दिखे, जबकि अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर और अश्वत्थामा जैसे पौराणिक पात्रों ने अतीत और वर्तमान के बीच पुल का काम किया। गुरु-शिष्य परंपरा, शिक्षा व्यवस्था, प्रतिभा, अवसर और व्यवस्था के टकराव को नाटक ने बेबाकी से सामने रखा। सवाल सीधा था: प्रतिभा होने के बावजूद अगर अवसर छिन जाए, तो जिम्मेदार कौन है?

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कलाकारों ने अपने किरदारों में जान फूंक दी। द्रोणाचार्य के किरदार में हर्षित देहरिया, एकलव्य एवं वकील की भूमिका में वंदिता पांडेय, अरविंद लीला के रूप में आशुतोष द्विवेदी, कृपि की भूमिका में दीक्षा बघेल और प्रेसिडेंट के किरदार में हर्ष अग्रवाल छाए रहे। यदु और अश्वत्थामा के किरदार में अंजली सिंह, चंदू की भूमिका में प्रांशु पांडेय, वकील-2 की भूमिका में याचिका, अनुराधा के किरदार में सुगंधा और विमलेंदु की भूमिका में ओमेंद्र ने भी अपनी छाप छोड़ी। रूद्र ने भीम, प्रिंसिपल एवं युधिष्ठिर की भूमिकाएं निभाईं। छोटा अश्वत्थामा के किरदार में याचना, सैनिक की भूमिका में श्रेया, अर्जुन के किरदार में विशाल और जज की भूमिका में दीपाली नजर आईं।

मंच पर गूंजा एकलव्य का दर्द: IKSVV में 'एक और द्रोणाचार्य' ने दर्शकों को झकझोरा, पूछा- प्रतिभा का हक कौन छीन रहा?

पर्दे के पीछे की टीम ने भी कमाल दिखाया। प्रकाश एवं मंच सज्जा की जिम्मेदारी हर्ष अग्रवाल और ओमेंद्र ने संभाली, जबकि संगीत की कमान आशुतोष द्विवेदी, छत्रपाल और हर्षित के हाथों में रही। पार्श्व मंच प्रबंधन दीक्षा बघेल ने किया, वेशभूषा वंदिता पांडेय की रही और सहायक निर्देशक आशुतोष द्विवेदी रहे।मंच पर गूंजा एकलव्य का दर्द: IKSVV में 'एक और द्रोणाचार्य' ने दर्शकों को झकझोरा, पूछा- प्रतिभा का हक कौन छीन रहा?

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पर्दा गिरा, लेकिन सवाल खत्म नहीं हुआ। नाटक ने पुराने प्रसंग के जरिए आज की व्यवस्था को आईना दिखाया और दर्शकों के बीच यह सवाल छोड़ दिया: क्या आज भी हमारे बीच ऐसे द्रोणाचार्य मौजूद हैं, जो प्रतिभा और अवसर के बीच दीवार खड़ी कर रहे हैं?




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