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हाईकोर्ट से 30 साल बाद मृतक के परिजन को मिला न्याय..पढ़ें पूरा मामला

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हाईकोर्ट से 30 साल बाद मृतक के परिजन को मिला न्याय..पढ़ें पूरा मामला  

अवैध कनेक्शन और बिजली चोरी के तर्कों को एकल पीठ ने किया खारिज

छत्तीसगढ़ खबर डेस्क खबर 24×7 बिलासपुर // 30 साल पहले खेत में लटकती बिजली की तार से कांट लगने से किशोर को मौत के मामले में छतीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चाहे बिजली चोरी से ली गई हो या अवैध कनेक्शन से करंट फैला हो लेकिन बिजली आपूर्ति करने वाली संस्था जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एवालपीठ ने छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया 1.50 लाख रुपए मुआवजा और ब्याज देने का आदेश बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने कहा, बिजली बोर्ड अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। मृतक के परिवार को मुआवजा देना ही होगा।

यह है पूरा मामला..

यह मामला वर्ष 1996 का है। बिलासपुर के तखतपुर तहसील के ग्राम मोढ़े निवासी दौलतराम साहू का 16 वर्षीय बेटा मनोज साहू खेत से गुजरते समय एक झूलती हुई लाइव बिजली तार के संपर्क में आ गया था। करंट लगते ही उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी। परिजनों ने आरोप लगाया कि यह तार पास के खेत में दी गई बिजली सप्लाई से जुड़ी थी, जो नियमों के विपरीत और खतरनाक तरीके से डाली गई थी।

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बिजली बोर्ड की दलील खारिज…

छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल ने कोर्ट में तर्क दिया कि, जिस किसान के खेत में तार लगी थी उसने अवैध रूम से बिजली चोरी कर कनेक्शन लिया था, इसलिए विभाग की कोई जिम्मेवारी नहीं बनती और नुकसान की भरपाई उस किसान से होनी चाहिए।chhattisgarh-hc-highcourt

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हाईकोर्ट का सख्त रुख….

हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि, बिजली जैसी खतरनाक वस्तु की आपूर्ति करने वाला विभाग यह नहीं कह सकता कि किसी और की गलती से मौत हुई। सप्लाई सिस्टम की निगरानी और सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी विभाग की है। कोर्ट ने कहा कि यदि टूटकर गिरती है तो  उसमे स्वतः करंट  बंद हो जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह विभाग की घोर लापरवाही है। बिजली आपूर्ति जैसे खतरनाक काम में स्ट्रिक्ट लाइबिडिटी होती है यानी गलती किसी की भी हो. जिम्मेवारी सप्लायर की ही होगी।

ट्रायल कोर्ट का फैसला रखा बरकरार

निचली अदालत ने 2004 में बिजली बोर्ड को आदेश दिया था कि वह पीड़ित परिवार को 1.50 लाख मुआवजा 9 प्रतिशत ब्याज (15 मई 2004 तका और उसके बाद 12 प्रतिशत बाज अदा करे हाईकोर्ट ने इस फैसले को सही हाते हुए बोर्ड की अपील खारिज कर दी।




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