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घनश्याम साहू को ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ युवा पुरस्कार 2025’

घनश्याम साहू को 'उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ युवा पुरस्कार 2025'
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घनश्याम साहू को ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ युवा पुरस्कार 2025

छत्तीसगढ़ खबर डेस्क खबर 24×7 सारंगढ़। जब किसी कलाकार की साधना केवल मंच तक सीमित न रहकर समाज की चेतना का हिस्सा बन जाती है, तव सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सांस्कृतिक परिवेश का उत्सव बन जाता है। ऐसी ही गौरवपूर्ण घड़ी तब आई जब सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के युवा रंगकर्मी, नाटककार, निर्देशक एवं लोक संस्कृति के संवाहक घनश्याम साहू को भारत सरकार की प्रतिष्ठित संस्था संगीत नाटक अकादमी द्वारा उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ युवा पुरस्कार 2025+ से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई।

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इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से मिला अकादमिक प्रतिभा का परिचय

कटेली गांव में पल-बढ़ कर छत्तीसगढ़ की गलियों, लोकगीतों, नाचा और जनजीवन की संवेदनाओं को अपनी लेखनी और मंचीय अभिव्यक्ति का आधार बनाया, आज वही कलाकार राष्ट्रीय सांस्कृतिक परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुका है। घनश्याम साहू का रंग-सफर अत्यंत प्रेरणादायी रहा है। उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से बी.ए. थिएटर तथा एम.ए. थिएटर में स्वर्ण पदक अर्जित कर अपनी अकादमिक प्रतिभा का परिचय दिया। उनके जीवन का प्रत्येक पड़ाव रंगमंचीय प्रयोगों, लोकसंस्कृति के अध्ययन और समाजोन्मुख रचनात्मकता से जुड़ा रहा है।घनश्याम साहू को 'उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ युवा पुरस्कार 2025'

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अभिनेता, लेखक और निर्देशक के रूप में कर रहे कार्य

लगभग तेरह वर्षों तक रायगढ़ की प्रतिष्ठित रंगसंस्था में अभिनेता, लेखक और निर्देशक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने रंगकला की विविध विधाओं को आत्मसात किया। महाराष्ट्र के झाड़ीपट्टी रंगमंच से लेकर छत्तीसगढ़ के नाचा तक के गहन अध्ययन ने उनकी सृजनशीलता को व्यापक आयाम प्रदान किया।

राष्ट्रीय नाट्य समारोहों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में जमाया रंग 

एक नाटककार के रूप में उनकी रचनाएँ ‘लाल दुपट्टा’, ‘अघनिया’, ‘बाबागिरी’, ‘बेटी’ और ‘मोह माया’ केवल कथाएँ नहीं, बल्कि समाज के अंतद्वंद्व, लोकजीवन की पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं की जीवंत अभिव्यक्तियाँ हैं। उनकी लेखनी में लोकभाषा की मिठास, जनजीवन की सच्चाई और परिवर्तन की आकांक्षा एक साथ दिखाई देती है। राष्ट्रीय स्तर पर अनेक रंगमहोत्सवों, भारत रंग महोत्सव, चक्रधर समारोह, राष्ट्रीय नाट्य समारोहों तथा सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी सक्रिय सहभागिता ने उन्हें एक बहुआयामी रंगकर्मी के रूप में स्थापित किया है। अभिनय, निर्देशन, गीत-लेखन, पटकथा-सृजन और फिल्म निर्माण जैसे विविध क्षेत्रों में उनका योगदान उनकी रचनात्मक व्यापकता का प्रमाण है।

 

घनश्याम साहू की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे आधुनिक रंगभाषा को लोक संस्कृति की जड़ों से जोड़‌कर देखते हैं। उनके लिए रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, सांस्कृतिक संरक्षण और मानवीय मूल्यों के संवर्धन का सशक्त उपकरण है। यही दृष्टि उन्हें समकालीन युवा रंगकर्मियों की भीड़ में विशिष्ट बनाती है। 

सम्मान गुरुओं का है अनुराग 

उन्होंने मोना माडर्न स्कूल सारंगढ़ के अपने गुरुओं शिक्षकों का विशेष आभार माना जिनके आदर्श और अनुरागों से आज वे इस सम्मान को प्राप्त करने जा रहे हैं। नाटक श्रेणी के 9 नामों में उनका नाम सर्वप्रथम है। कटेली, खरी छोटे ग्राम के स्व. तिहारू प्रसाद श्रीमति गनेशी बाई की यह संतान आज दिल्ली में भी नाचा का परचम सजा दिया।

बड़े मंच पर मिला पुरस्कार 

35 वर्षीय इस युवा के नाम इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ का जहां बीए, एमए (नाटक) के स्वर्ण पदक हैं तो वहीं चक्रधर समारोह 2013, टीएफटी 2018 22, रंग महोत्सव खैरागढ़ 2025 सम्मान के साथ-साथ कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार इनकी झोली मे है। वर्तमान में वे अपने प्रि प्रोडक्शन कार्य हेतु अपनी धर्मपत्नी मनीषा के साथ खैरागढ़ में रहते हुए देश-विदेश का कार्य संपादित करते हैं। ज्ञात हो कि मनीषा भी संगीत परिवेश में वायलिन में अपने गुरू प्रोफेसर डॉ. हिमांशु बिसरू के सानिध्य में पी.एच.डी. कर रही हैं।

 

‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ युवा पुरस्कार’ प्राप्त कर उन्होंने न केवल अपना, बल्कि सारंगढ़-बिलाईगढ़, रायगढ़ और समूचे छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया है। यह सम्मान उन असंख्य युवाओं के लिए भी प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद कला-साधना के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन का स्वप्न देखते हैं।

 

आज जब राष्ट्रीय मंच पर घनश्याम साहू का नाम सम्मान के साथ उच्चारित हो रहा है, तब यह विश्वास और मजबूत होता है कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरती प्रतिभाओं से समृद्ध है। यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि सच्ची लगन, निरंतर अभ्यास और अपनी मिट्टी से जुड़ाव किसी भी कलाकार को राष्ट्रीय पहचान दिला सकता है। घनश्याम साहू का यह सम्मान वास्तव में उस लोकधुन का सम्मान है, जो गांव की चौपाल से निकलकर राष्ट्रीय सांस्कृक्तिक चेतना का स्वर बन गई है।




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