सरपंच सदन में कबाड़ की तरह सालों से पड़ा हुआ गरीबों का टिफिन, 5,860 मजदूरों का हक अब भी अधर में
2016-17 के हितग्राही, 2026-27 में भी इंतजार
छत्तीसगढ़ खबर डेस्क खबर 24×7 खैरागढ़ // जनपद पंचायत खैरागढ़ में मुख्यमंत्री मनरेगा मजदूर टिफिन वितरण योजना की तस्वीर सरकारी योजनाओं की सुस्ती की कहानी बयां कर रही है। वर्ष 2016-17 में मनरेगा के ऐसे परिवारों को टिफिन डिब्बा दिया जाना था, जिनके सदस्य ने 30 दिन या उससे अधिक रोजगार प्राप्त किया था।
राज्य से आया था 15 हजार टिफिन
राज्य शासन से 15,220 टिफिन डिब्बे मिले, जिनमें 9,360 का वितरण हुआ, जबकि 5,860 टिफिन आज भी वितरण का इंतजार कर रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2026-27 चल रहा है, लेकिन लगभग दस साल बाद भी हजारों गरीब मजदूर अपने अधिकार से वंचित हैं।
सरपंच सदन बना कबाड़घर, प्रतिनिधियों को बैठने तक की जगह नहीं
जिन टिफिन डिब्बों को वर्षों से रखा गया है, वह स्थान सरपंच सदन है। यह भवन पंचायत प्रतिनिधियों के बैठने, जनपद कार्य से आने वाले सरपंचों के रुकने और आवश्यक बैठकों के लिए बनाया गया था। लेकिन वर्षों से हजारों टिफिन डिब्बे इसी भवन में पड़े होने के कारण सरपंच सदन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है। जनपद आने वाले सरपंचों को बैठने तक की समुचित व्यवस्था नहीं मिल पा रही है, जबकि उनका भवन वर्षों से सरकारी सामग्री का गोदाम बना हुआ है।
सरपंच संघ की बैठक में उठा मुद्दा, जल्द हटाने की बनी रणनीति
हाल ही में हुई सरपंच संघ की बैठक में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। कई सरपंचों ने कहा कि वर्षों से पड़े टिफिन डिब्बों को या तो पात्र हितग्राहियों में वितरित किया जाए अथवा नियमानुसार उनका निस्तारण कर सरपंच सदन को तत्काल खाली कराया जाए। बैठक में यह भी कहा गया कि पंचायत प्रतिनिधियों के लिए बने भवन को कबाड़घर बनाए रखना उचित नहीं है। इस संबंध में प्रशासन के समक्ष मांग रखने और आवश्यक पहल करने पर भी चर्चा हुई।

मार्गदर्शन के नाम पर बीत गया एक दशक
जनपद पंचायत के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2018 में विधानसभा चुनाव की आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण शेष टिफिन का वितरण नहीं हो सका। बाद में कलेक्टर एवं जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से मार्गदर्शन मांगा गया, लेकिन वर्षों बाद भी कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाया। नतीजा यह है कि एक दशक बीतने के बाद भी सामग्री गोदाम में पड़ी है और पात्र हितग्राही अपने अधिकार का इंतजार कर रहे हैं।
गरीबों का हक आखिर कब मिलेगा, प्रशासन कब जागेगा?
जिला पंचायत के सदस्यों को भी इस पूरे मामले की जानकारी होने की बात कही जा रही है, लेकिन अब तक कोई प्रभावी पहल सामने नहीं आई। सवाल यह है कि गरीब मजदूरों के लिए खरीदी गई सामग्री आखिर कब तक गोदाम में धूल खाती रहेगी। यदि पात्र हितग्राहियों तक योजना का लाभ नहीं पहुंचा तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि गरीबों के अधिकारों की अनदेखी भी मानी जाएगी। अब जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन पूरे मामले का संज्ञान लेकर वर्षों से लंबित टिफिन वितरण का निर्णय करे और सरपंच सदन को उसके वास्तविक उद्देश्य के लिए खाली कराए।
ये कहना है अधिकारी का..![]() जनपद पंचायत खैरागढ़ के सीईओ हिमांशु गुप्ता ने कहा कि वर्ष 2016-17 के टिफिन वितरण का मामला उनके खैरागढ़ जनपद पंचायत में आने से पहले का है। पूरे रिकॉर्ड की जांच और संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेने के बाद ही वे इस मामले में विस्तृत जानकारी दे पाएंगे। |
दो सरकारें बदलीं, लेकिन टिफिन वितरण आज भी अधूरा
वर्ष 2018 में विधानसभा चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू होने से टिफिन वितरण की प्रक्रिया रुक गई। इसके बाद राज्य में सरकार बदलकर कांग्रेस की सरकार बनी और यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। वर्ष 2023 के अंत में फिर भाजपा की सरकार बनने के बाद भी करीब दो वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जनपद पंचायत खैरागढ़ में वर्षों से लंबित पड़े 5,860 टिफिन डिब्बों के वितरण को लेकर अब तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब सरकारें बदल गईं, अधिकारी भी बदलते रहे, तब भी आखिर गरीब मनरेगा मजदूरों के लिए खरीदी गई सामग्री आज तक अपने वास्तविक हितग्राहियों तक क्यों नहीं पहुंच सकी।



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