लमती बांध परियोजना पर ग्रामीणों का गुस्सा, आंदोलन की दी चेतावनी
छत्तीसगढ़ खबर डेस्क खबर 24×7 खैरागढ़ // जिले में लमती नदी पर प्रस्तावित डेम परियोजना अब बड़े विवाद का रूप लेती जा रही है। ग्राम लछना, बोरला, महुआढार और कटेमा के सैकड़ों ग्रामीण जिला मुख्यालय पहुंचकर सड़क पर उतर आए। चिलचिलाती गर्मी में घंटों इंतजार के बाद भी जब कोई जिम्मेदार अधिकारी सामने नहीं आया, तो आक्रोश और गहरा गया।
ज्ञापन के साथ दी चेतावनी
ग्रामीणों ने ज्ञापन सौंपते हुए साफ चेतावनी दी, यदि उनकी बात नहीं सुनी गई, तो आंदोलन और तेज होगा।

डुबान क्षेत्र में जारी है विकास कार्य
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस जमीन को डेम के डुबान क्षेत्र में बताया जा रहा है, उसी जगह पर सरकार खुद विकास कार्य करा रही है। पंचायत के जरिए सीसी रोड का निर्माण जारी है, वहीं प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 8 से 10 मकान बन रहे हैं। सवाल उठना लाजिमी है, जब सरकार खुद इस क्षेत्र को बसाने और विकसित करने में करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो फिर उसी इलाके को डुबाने की तैयारी क्यों?
आसपास के जीवन का आधार है लमती नदी
ग्रामीणों का कहना है कि लमती नदी उनके लिए सिर्फ जल स्रोत नहीं, बल्कि जीवन की धुरी है। यही रास्ता खेती, रोजगार और दैनिक आवागमन का आधार है। प्रस्तावित डेम बनने की स्थिति में लछनाटोला समेत कई बस्तियां पूरी तरह डुबान में आ जाएंगी। इसका सीधा असर हजारों लोगों की आजीविका, बच्चों की शिक्षा और सामाजिक ढांचे पर पड़ेगा। पुश्तैनी जमीन छिनने का डर लोगों के मन में गहरा बैठ चुका है।![]()
आश्वासन के 6 माह बाद भी नहीं दी गई कोई जानकारी
इस विरोध के पीछे एक पुराना जख्म भी है। इसके लिए लगभग 6 माह पहले भी कलेक्टर कार्यालय पहुंचे तो आश्वासन देकर लौटा दिए थे लेकिन आज तक कोई भी जानकारी नहीं दी गई है।

प्रधानपाट के विफलता को छिपाने लमती परियोजना
राजकुमारी नेताम, मीना वर्मा सहित ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पहले बनाए गए प्रधानपाट बैराज पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए थे, लेकिन वह पिछले 10–12 वर्षों से जर्जर और बेकार पड़ा है। अब उसी विफलता को छिपाने के लिए नई “लमती परियोजना” लाई जा रही है, जिसमें फिर से ग्रामीणों को उजाड़ने की तैयारी है। यह आरोप सीधे तौर पर सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
एक तरफ विकास कार्य दूसरी तरफ उजड़ने का डर भी
सरपंच कमलेश वर्मा ने दो टूक कहा, “गांव में अजीब स्थिति बन गई है, एक तरफ विकास कार्य चल रहे हैं, दूसरी तरफ उसी जमीन से उजड़ने का डर है। लोग न ठीक से घर बना पा रहे हैं, न भविष्य की योजना बना पा रहे हैं। हमारी मांग है कि नए डेम की बजाय पुराने बैराज को ही दुरुस्त किया जाए।” पर्यावरणीय पहलू भी कम गंभीर नहीं हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, डेम निर्माण से बड़े पैमाने पर जंगल प्रभावित होंगे, यह मामला सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक पर्यावरणीय संतुलन से भी जुड़ा है।

ये है ग्रामीणों की मांग
ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि डुबान क्षेत्र की जमीनों के स्पष्ट दस्तावेज, एनओसी, नक्शा-खसरा सार्वजनिक किए जाएं और बिना सहमति किसी भी निर्माण कार्य पर रोक लगाई जाए। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या सरकार ‘विकास’ के नाम पर उन्हीं लोगों को उजाड़ने जा रही है, जिनके लिए योजनाएं बनाई जाती हैं? और अगर हां, तो क्या इस बार भी इतिहास खुद को दोहराएगा? खैरागढ़ में उठी यह आवाज अब सिर्फ एक गांव की नहीं रही, यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जहां योजनाएं कागजों पर बनती हैं और कीमत जमीनी लोग चुकाते हैं।


