खय्याम और बच्चन के प्रभाव से मुक्त कराती कृति: चल ढक्कन खोल
विनय शरण सिंह सुने और पढ़े जाने वाले कवि हैं। इसीलिए उन्हें इस तरह किताब के रूप में पढ़ना एक सुखद अहसास है । आज के दौर में जब कविता को देखते हैं, तो अर्थ-गंभीर वाली कविताएं सामने आती हैं या फिर मंचों में पढ़ी जाने वाली सतही कविताएं । विनय शरण सिंह की ‘चल ढक्कन खोल’ अर्थ गम्भीरता के साथ-साथ मंचीयता को अपने में समेटे हुए है ।

हर कविता समय मांगती है और ‘चल ढक्कन खोल’ जैसे रचना संग्रह के लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि इसे पढ़ना इतना सहज है कि इसकी सहजता में खोकर कविता से दूर हो जाने का खतरा है। इस एकाकी में ‘वाह-वाह’ और तालियों में रचना दम तोड़ देती है। ऐसा बहुत से रचनाकारों के साथ होता आ रहा है। इस माने में हम इतरा सकते हैं कि विनय शरण सिंह की ‘चल ढक्कन खोल’ शराब और शराबियों को आधार बनाकर लिखी जाने वाली लोक भाषा छत्तीसगढ़ी का पहला और अच्छा रचना- संग्रह है।
जब शराब और शराबी के आधार वाली रचना की बात हो रही हो तो उमर खय्याम और डॉ. हरिवंश राय बच्चन की बात न करना बेमानी होगी और इस रचना संग्रह और हमारे समय के साथ अन्याय होगा। लगभग सवा नौ सौ साल पहले लिखी गयी उमर खय्याम की रुबाइयाँ, जिनमें जीवन की अर्थहीनता में व्यक्तिगतता की खोज करते हुए रहस्यवाद में गिरना रचना की परिणिति है, तो सन् 1935 में बच्चन जी द्वारा जीवन की निराशा को मधु उन्मादी भौतिकवादी अध्यात्म को स्वीकार कर हालावादी होना है। और अब, हमारे समय में विनय शरण सिंह ‘चल ढक्कन खोल’ में शराबियों की हरकत और उसके पूरे प्रभाव को व्यंग्य में साधते हुए पुराने मानदण्डों को तोड़ते ही नहीं, समसामयिक प्रश्न उठाते हैं और अपने समय से बार- बार टकराते हैं –
धन हे वो गुरू जेन ये मंतर सिखाय हे,
धन हे वो चेला जेन ये मंतर ला पाय हे,
मंदहा मन हा जेन महा मंतर ला जपत रथे
वो महा मंतर ‘कोन मंद: पियाय ‘ हे ।
वे केवल मानदण्डों को तोड़ते ही नहीं बल्कि अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से कहने के लिए रुबाइयों की तरह चार पंक्तियों में अपनी बात रखते हैं और मंगलाचार की तरह रचना संग्रह की शुरूवात करते हैं –
वर दे उप्पर वाले, दरुहा ला ये वर दे,
दारूभट्ठी के लकठच् मा रहे-बसे बर घर दे, उहिंचे पीना,उहिंचे खाना,जादा दुरिया परे न जाना
रोज बिहनिया ला के कोई बोतल एक अमर दे ।
नोट-बंदी हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। और सत्तापक्ष राष्ट्रवाद के मायाजाल में जनता को भले आँख वाले अंधा बना दे पर विनय शरण जैसे रचनाकारों की व्यंग्य नजर से भला कैसे बच सकते हैं, ‘चल ढक्कन खोल की ये पंक्यिों इसका उदाहरण हैं –
बडे़ – बडे़ के हाथ-पाँव अउ मरुवा सुखागे,
नोट-बंदी के होय ले सबके तरुवा सुखागे,
तभो पीने वाला मन ला कोई फरक नइ परिस
फेर दारू-बंदी के बात सुन के दरुहा सुखागे।
दलगत राजनैतिक दलों की छवि और चुनाव आयोग की भूमिका अब के चुनाव में किसी से छिपी नहीं है । उनकी स्थिति ‘पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारे जाने है/जाने न जाने गुल ही ना जाने, बाग तो सारा जाने है,’ जैसी है। इस पर वे प्रेमचंद के ‘घीसू और माधो’ की याद ताजा कर देते हैं –
सहर-सहर अउ गाँव-गाँव मा आथे गुरू,
पेटी-पेटी थोक के भाव मा आथे गुरू,
हर पाल्टी वाला मन लान- लान के देथें
पिये के असली मंजा तो चुनाव मा आथे गुरू।
मंहगाई का नंगा नाच हमारे समय में चारों ओर है। हर तबका इससे बुरी तरह प्रभावित है, सिवाय व्यवस्था से जुड़े और शराबियों और शराबखाने के बहाने सत्ता पक्ष । विनय शरण जी की व्यंग्य नजर वहाँ पर भी है –
साहेब के सान मा कोई असर नइ दिखे,
बाबू के चाय-पान मा कोई असर नइ दिखे,
मंहगाई के असर पूरा बजार मा दिखते है
फेर दारू के दुकान मा कोई असर नइ दिखे।
उन पर मंहगाई के असर नहीं पड़ने का कारण रिश्वतखोरी है । इसीलिए सत्तापक्ष के हांका पारने और इसी दम पर फिर से सत्ता में आना अब व्यवहार बन गया है । इस तरफ कवि विनय शरण जी की व्यंग्य नजर इस तरह है –
साहेब-सुबहा के ढक्कन हा घर मा खुलथे,
बाबू अउ चपरासी के हा दफ्तर मा खुलथे,
नेता मन के ढक्कन के फेर का कहना है
कभू रायपुर त कभू बस्तर मा खुलथे ।
कहते हैं कि जब चारों ओर कीचड़ हो तो पत्थर दूर फेंकना चाहिए । कवि विनय शरण सिंह ” चल ढक्कन खोल” में अपने ऊपर कीचड़ के छीटों की परवाह नहीं करते हुए अपने व्यंग्य नजर से रिश्वतखोरी की पड़ताल करते हुए पाते हैं, कि रिश्वतखोरी की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं जो उनकी इन पंक्तियों में देखने को मिलती है –
धरमपुरा के भट्टी ले लान के पीथें,
कका अउ भतीजा दुनों तान के पीथें,
कका माने सरपंच अउ भतीजा माने सचिव
पंचायत के योजना ला छान-छान के पीथें।
वे जिस तरह अपने रचना संग्रह की शुरुवात करते हैं ,ठीक वैसे खत्म भी करते हैं। संग्रह की शुरुवात कथा काव्य की तरह है तो समापन भी किसी लोककथा की तरह, जिसे हम दादा- दादी, नाना-नानी से सुनते हैं। इस तरह वे कविता की वाचिक परम्परा से जुड़ते हैं, जो इन दिनों कवियों में कम होती जा रही है ।
जइसे सबके चुरथे तोरो दार-भात चुरे,
जइसे सबके पुरथे तोरो कहिनी घलो पुरे,
पी के मस्ती मा डोले बर तोला रोज मिले
जइसे सबके फिरथे तइसे तोरो दिन बहुरे।
वाचिक परम्परा के होने का सबसे बडा़ कारण उनके रचना संग्रह के कथ्य का आधार कस्बाई कल्चर है, अपनी विद्रुपताओं के साथ। यह मौजूदा अर्थ व्यवस्था और राजनैतिक व्यवस्था से उपजी सामाजिक व्यवस्था के कारण है। इसी से ही कविता संग्रह जमीन पाता है और इसीलिए वह पुराने मानदण्ड को भाव के स्तर पर तोड़ते हुए पाठक को खय्याम और बच्चन के प्रभाव से मुक्त करते हुए अपनी अलग पहचान बनाता है ।
विकास की अंधी दौड़ में गाँव को हमने लगभग खो दिया। हमारे सामने गाँव के रूप में कस्बा ही है। अब कस्बों की उम्र ऊँगलियाँ भर की है। अपने रचना संग्रह में कस्बाई कल्चर के प्रति विश्वास और उमर खय्याम और बच्चन के प्रभाव से मुक्त करते हुए पाठकों को अपनी समझ के ढक्कन को खोलने के लिए प्रेरित करने के लिहाज से विनय शरण सिंह की यह छत्तीसगढ़ी व्यंग्य कृति आश्वस्त करती है ।
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