सरपंच पतियों की मनमानी से पंचायत व्यवस्था सवालों के घेरे में, महिला सशक्तिकरण पर उठ रहे प्रश्न
छत्तीसगढ़ खबर डेस्क खबर 24×7 गंडई पंडरिया // केसीजी जिले और जनपद पंचायत के अंतर्गत अधीनस्थ ग्राम पंचायतों में इन दिनों सरपंच पति की बढ़ती दखलंदाजी को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। पंचायत व्यवस्था में महिलाओं को आरक्षण देकर उन्हें सशक्त बनाने का उद्देश्य रखा गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है।
कई ग्राम पंचायतों में निर्वाचित महिला सरपंचों की जगह उनके पति ही निर्णय लेते देखे जा रहे हैं, जिससे न केवल पंचायती राज व्यवस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि गांव का विकास कार्यों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है।
सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि ग्राम पंचायतों के दैनिक कार्यों से लेकर मासिक बैठकों तक में सरपंच पतियों का हस्तक्षेप बढ़ गया है। पंचायत बैठकों में उनकी उपस्थिति और निर्णयों में उनकी भूमिका, पंचायती राज अधिनियम की खुली अवहेलना मानी जा रही है। नियमों के अनुसार पंचायत के कार्यों में केवल निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को ही अधिकार है, लेकिन कई स्थानों पर यह नियम केवल कागजों तक सीमित रह गया है।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कई मामलों में सरपंच पति सीधे तौर पर सचिवों और रोजगार सहायकों पर दबाव बनाकर कार्य करवा रहे हैं। आरोप है कि कुछ स्थानों पर यह दबाव वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा दे रहा है। फर्जी भुगतान, बिना स्वीकृति के कार्य और मनमाने तरीके से राशि खर्च करने जैसी शिकायतें भी सामने आ रही हैं, जिससे पंचायत की छवि धूमिल हो रही है।
जनपद पंचायत स्तर पर भी इस समस्या का असर देखने को मिल रहा है। कई अधिकारियों का कहना है कि सरपंच पतियों का हस्तक्षेप फाइलों की प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्यों में भी बाधा बन रहा है। इससे न केवल कार्यों में देरी हो रही है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता भी प्रभावित हो रही है।
महिला सरपंचों की स्थिति भी चिंता का विषय बनती जा रही है। कई जगहों पर महिला सरपंचों को पंचायत के विकास कार्यों, योजनाओं और वित्तीय लेनदेन की पूरी जानकारी तक नहीं होती। उनके नाम पर कार्य तो होते हैं, लेकिन वास्तविक नियंत्रण उनके पतियों के हाथ में होता है। इससे महिला आरक्षण का मूल उद्देश्य – महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी दिलाना – कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।
ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि महिला आरक्षण अब कई जगहों पर केवल चुनाव तक सीमित रह गया है। चुनाव जीतने के बाद वास्तविक सत्ता सरपंच पति के हाथों में चली जाती है, जिससे महिलाओं की भूमिका औपचारिक बनकर रह जाती है। इससे न केवल महिलाओं का अधिकार प्रभावित होता है, बल्कि पंचायत की कार्यप्रणाली भी असंतुलित हो जाती है।
इस स्थिति से सचिव, रोजगार सहायक, उपसरपंच और पंचगण भी परेशान हैं। उनका कहना है कि जब सभी निर्णय सरपंच पति द्वारा लिए जाते हैं, तो अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका नगण्य हो जाती है। इससे पंचायत में सामूहिक निर्णय की परंपरा खत्म हो रही है और विवाद की स्थिति भी बन रही है।
कई ग्राम पंचायतों में सरपंच पतियों की दखलंदाजी के कारण विकास कार्यों की गुणवत्ता और गति दोनों प्रभावित हो रही हैं। योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है और कई बार प्राथमिकता वाले कार्य भी नजर अंदाज हो जाते हैं। इससे ग्रामीणों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रशासन इस पर सख्त कार्रवाई करेगा? पंचायत कानूनों के स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद यदि इस तरह की अनियमितताएं जारी रहती हैं, तो यह पूरे पंचायत तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जरूरत है कि संबंधित अधिकारी इस मामले को गंभीरता से लें और नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें, ताकि पंचायतों में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे और महिला सशक्तिकरण का उद्देश्य भी पूरा हो सके।![]()
जानकारी अनुसार सरपंच पतियों की मनमानी इस कदर हावी हो चुकी है ग्राम पंचायत से लेकर जनपद पंचायत में भी खुद को सरपँच प्रतिनिधि कहकर हर कार्यो में सरपंच पतियों की दखल हो रही है वही दूसरी ओर कई महिला सरपंच चुनाव जीते एक वर्ष बीत जाने के बाद भी अपने ग्राम पंचायत में क्या काम चल रहा है या ग्राम पंचायतों के कार्यो से अनजान है जो भ्रस्टाचार को बढ़ावा दिखाई देता नजर आ रहा है।
केशवरी देवांगन सीईओ जनपद पंचायत छुईखदान का कहना है की इस संबंध में लिखित शिकायत प्राप्त नहीं हुई है, इस संबंध में शासन का स्पष्ट गाइडलाइन और निर्देश है , यहां मेरे आते ही एक पत्र सभी ग्राम पंचायत को जारी किया गया था, की बैठक में महिला सरपंच की उपस्थिति हो, मैं सरपंच पतियों के हाथ से किसी प्रकार का कागजात नहीं लेता, महिला सरपंच साथ में आते हैं तो बात समझ में आती है, मैं स्वयं महिला हूं मेरा सोचना है कि महिला आगे आए वह अपना अधिकार और जिम्मेदारी समझे कोशिश कर रही हूं कि कहीं से सरपंच पतियों का दखलदाजी न आए, मैं स्वयं महिला सरपंच को सामने साइन करवाती हूं।
प्रेम कुमार पटेल सीईओ जिला पंचायत खैरागढ़ का कहना है की इस संबंध में जनपद सीईओ को सभी पंचायतों के लिए पत्र जारी कराया जाएगा, महिला सशक्तिकरण को लेकर जो शासन से पत्र मिला है, उसका स्मरण कराया जाएगा। आगामी टीएल की बैठक में जनपद सीईओ के सामने बात रखते हुए निर्देशित किया जाएगा।

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